Kabir das dohe mp3 download. [Latest*] Kabir Das Ke Dohe In Hindi कबीर दास के दोहे हिन्दी में PDF Download 2019-07-24

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Kabir Ke Dohe In Hindi Arth Sahit PDF

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इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा. प्रेम गहन- सघन भावना है — खरीदी बेचे जाने वाली वस्तु नहीं! कबीर दास जी के दोहे Kabir Das Ke Dohe Hindi Do you want to read Kabir Ke Dohe in Hindi? जिनके पास लाखों करोड़ों की संपत्ति थी वे भी यहाँ से खाली हाथ ही गए हैं — इसलिए जीते जी धन संपत्ति जोड़ने में ही न लगे रहो — कुछ सार्थक भी कर लो! आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के ही समान है. उससे यह न पूछो की वह किस जाति का है साधु कितना ज्ञानी है यह जानना महत्वपूर्ण है. बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय। अर्थ : इस दोहे में Kabir Ji नें एक बहुत ही अच्छी बात लिखी है, वे कहते हैं जब में पुरे संसार में बुराई ढूँढने के लिए निकला मुझे कोई भी, किसी भी प्रकार का बुरा और बुराई नहीं मिला। परन्तु जब मैंने स्वयं को देखा को मुझसे बुरा कोई नहीं मिला। कहने का तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति अन्य लोगों में गलतियाँ ढूँढ़ते हैं वही सबसे ज्यादा गलत और बुराई से भरे हुए होते हैं। 4. Each of the rights over the tunes would be the property of their respective owners. जिस मानव मन को प्रेम ने नहीं छुआ, वह प्रेम के अभाव में जड़ हो रहेगा. Download mp3 Kabir Dohe Mp3 Song Download free! जो फल वृक्ष से नीचे गिर पड़ता है वह पुन: उसकी डाल पर नहीं लगता.

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पहले जागरूक न थे — ठीक उसी तरह जैसे कोई किसान अपने खेत की रखवाली ही न करे और देखते ही देखते पंछी उसकी फसल बर्बाद कर जाएं। —34— रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय । हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ॥ अर्थ: रात नींद में नष्ट कर दी — सोते रहे — दिन में भोजन से फुर्सत नहीं मिली यह मनुष्य जन्म हीरे के सामान बहुमूल्य था जिसे तुमने व्यर्थ कर दिया — कुछ सार्थक किया नहीं तो जीवन का क्या मूल्य बचा? उन्हें तुम अपने बल पर पूरा नहीं कर सकते. ज्ञान की जागृति को हासिल कर प्रभु का नाम लो।सजग होकर प्रभु का ध्यान करो।वह दिन दूर नहीं जब तुम्हें गहन निद्रा में सो ही जाना है — जब तक जाग सकते हो जागते क्यों नहीं? Tags: Kabir Rahim Ke Dohe Unknown full album. यदि मनुष्य मन में हार गया — निराश हो गया तो पराजय है और यदि उसने मन को जीत लिया तो वह विजेता है. निर्मम मन इस भावना को क्या जाने? चन्दन का वृक्ष यदि छोटा — वामन — बौना भी होगा तो भी उसे कोई नीम का वृक्ष नहीं कहेगा. किन्तु सही व्यक्ति की परख एक बार में ही हो जाती है! स्वाति नक्षत्र की बूँद की आशा लिए हुए समुद्र की अपार जलराशि को तिनके के बराबर समझती है. जब नेत्रों में राम विराज रहे हैं तो वहां कोई अन्य कैसे निवास कर सकता है? ईश्वर की सत्ता का बोध तभी हुआ जब अहंकार गया.

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Guru Mahima

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तुम अपनी स्थिति को, दशा को न जाने दो. जब अहम समाप्त हुआ तभी प्रभु मिले. Download mp3 Kabir Ke Dohe Mp3 By Kumar Vishu free! मित्र, रूई में लिपटी इस अग्नि — अहंकार — को मैं कब तक अपने पास रखूँ? सब मनुष्य स्वार्थ में बंधे हुए हैं, जब तक इस बात की प्रतीति — भरोसा — मन में उत्पन्न नहीं होता तब तक आत्मा के प्रति विशवास जाग्रत नहीं होता. जहां खुशियाँ थी वहां गम छा जाता है जहां हर्ष था वहां विषाद डेरा डाल सकता है — यह इस संसार में होता है!. कबीर कहते हैं कि जो साधु —असाधु को परख लेता है उसका मत — अधिक गहन गंभीर है! जीवन में असावधानी के कारण इंसान बहुत कुछ गँवा देता है — उसे खबर भी नहीं लगती — नुक्सान हो चुका होता है — यदि हम सावधानी बरतें तो कितने नुक्सान से बच सकते हैं! कहो , भगवान् का दुर्लभ दर्शन कैसे प्राप्त हो? When there is a damaged backlink we're not in control of it. सभी का अंत एक है! निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। अर्थ : इस दोहे में कबीर जी ने बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही हैं उन लोगों के लिए जो दिन रात आपकी निंदा करते हैं और आपकी बुराइयाँ बताते हैं। कबीर जी कहते हैं ऐसे लोगों को हमें अपने करीब रखना चाहिए क्योंकि वे तो बिना पानी, बिना साबुन हमें हमारी नकारात्मक आदतों को बताते हैं जिससे हम उन नकारात्मक विचारों को सुधार कर सकारात्मक बना सकते हैं। 14.

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Kabir Dohe 11 To 20 Song Download Video

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काल अपने हाथों में तेरे केश पकड़े हुए है। मालूम नहीं, वह घर या परदेश में, कहाँ पर तुझे मार डाले। —20— पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात। एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात। अर्थ: कबीर का कथन है कि जैसे पानी के बुलबुले, इसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षणभंगुर है।जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही ये देह भी एक दिन नष्ट हो जाएगी। —21— हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास। सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास। अर्थ: यह नश्वर मानव देह अंत समय में लकड़ी की तरह जलती है और केश घास की तरह जल उठते हैं। सम्पूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख, इस अंत पर कबीर का मन उदासी से भर जाता है। — —22— जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं। जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं। अर्थ: इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा। जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा। —23— झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद। खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद। अर्थ: कबीर कहते हैं कि अरे जीव! आपने आस-पास को खुशबू से ही भरेगा —80— जानि बूझि साँचहि तजै, करै झूठ सूं नेह । ताकी संगति रामजी, सुपिनै ही जिनि देहु ॥ अर्थ: जो जानबूझ कर सत्य का साथ छोड़ देते हैं झूठ से प्रेम करते हैं हे भगवान् ऐसे लोगों की संगति हमें स्वप्न में भी न देना. संगति का अच्छा प्रभाव ग्रहण करना चाहिए — आपने गर्व में ही न रहना चाहिए. अर्थात वास्तविकता का ज्ञान न होने से मनुष्य संसार में रमा रहता है जब संसार के सच को जान लेता है — इस स्वार्थमय सृष्टि को समझ लेता है — तब ही अंतरात्मा की ओर उन्मुख होता है — भीतर झांकता है! आशा, तृष्णा कभी नहीं मरती — ऐसा कबीर कई बार कह चुके हैं. हो सके तो इससे निकल कर भाग जाओ. कुछ भी हाथ नहीं आया. ईश्वर को भी मन के विश्वास से ही पा सकते हैं — यदि प्राप्ति का भरोसा ही नहीं तो कैसे पाएंगे? प्रभु तुम इन दो नेत्रों की राह से मेरे भीतर आ जाओ और फिर मैं अपने इन नेत्रों को बंद कर लूं! तू क्या गर्व करता है? तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय, कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय। अर्थ : इस दोहे में भी कबीर जी अच्छे विचारों और मन में कडवाहट को हटाने का उद्धरण दे रहे हैं। कबीर दास जी कह रहे हैं जीवन में कभी भी निचे पड़े हुए तिनके तक की निंदा भी ना करिए जो पैर के निचे चुभ गया हो क्योंकि अगर वही तिनका अगर आँख में आ गिरा तो बहुत दर्द होगा। 18.

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कबीर दास के 101 प्रसिद्ध दोहे हिंदी अर्थ सहित

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माया मरी ना मन मरा, मर-मर गए शरीर, आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर। अर्थ : कबीर दास जी समझा रहे हैं, मनुष्य की इच्छा, उसका धन, उसका शारीर, सब कुछ नष्ट हो जाता है फिर भी मनुष्य की आशा और भोग की आस नहीं समाप्त होती। 19. जिसकी छाया शीतल हो , फल सघन हों और जहां पक्षी क्रीडा करते हों! ॥ अर्थ: कबीर कहते हैं कि जीवन की नौका टूटी फूटी है जर्जर है उसे खेने वाले मूर्ख हैं जिनके सर पर विषय वासनाओं का बोझ है वे तो संसार सागर में डूब जाते हैं — संसारी हो कर रह जाते हैं दुनिया के धंधों से उबर नहीं पाते — उसी में उलझ कर रह जाते हैं पर जो इनसे मुक्त हैं — हलके हैं वे तर जाते हैं पार लग जाते हैं भव सागर में डूबने से बच जाते हैं —66— मन जाणे सब बात जांणत ही औगुन करै । काहे की कुसलात कर दीपक कूंवै पड़े ॥ अर्थ: मन सब बातों को जानता है जानता हुआ भी अवगुणों में फंस जाता है जो दीपक हाथ में पकडे हुए भी कुंए में गिर पड़े उसकी कुशल कैसी? Kabir Rahim Ke Dohe top song is Odho Kaam Bado Kare Tauna Badayi. किससे गुहार करूं — विनती या कोई आग्रह करूं? Kabir Rahim Ke Dohe mp3 songs , download free Kabir Rahim Ke Dohe songs, Kabir Rahim Ke Dohe all songs » ». वीरान सुनसान हो जाएगा जो अभी हंसता खिलखिलाता घर आँगन है! वह सुवासित ही रहेगा और अपने परिवेश को सुगंध ही देगा. इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा. आत्मा-परमात्मा दो नहीं एक हैं — आत्मा परमात्मा में और परमात्मा आत्मा में विराजमान है.

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Kabir Ji ke Dohe

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त्याग और बलिदान के बिना प्रेम को नहीं पाया जा सकता. लेकिन बांस अपनी लम्बाई — बडेपन — बड़प्पन के कारण डूब जाता है. जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान, मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान। अर्थ : इस दोहे में कबीर दास जी लोगों को जाती-पाती के भेदभाव को छोड़ जहाँ से ज्ञान मिले वहां से ज्ञान बटोरने की बात की है। यह समझाते हुए कह रहे हैं किसी भी विद्वान व्यक्ति की जाती ना पूछ कर उससे ज्ञान सिखना समझना चाहिए, तलवार के मोल को समझो, उसके म्यान का कोई मूल्य नहीं। 20. This web just only a search engine media, not a storage or cloud server from the file. पंडितों ने पृथ्वीपर पत्थर की मूर्तियाँ स्थापित करके मार्ग का निर्माण किया है. कल या परसों ये ऊंचाइयां और आप भी धरती पर लेट जाएंगे ध्वस्त हो जाएंगे और ऊपर से घास उगने लगेगी! तुम अभी से सावधान क्यों नहीं हो जाते! जरा-सी चोट लगते ही यह फूट गया.

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पर जब झूठे को एक सच्चा आदमी मिलता है तभी प्रेम टूट जाता है. देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो उसके मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है। —24— ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस। भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस। अर्थ: कबीर संसारी जनों के लिए दुखित होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथप्रदर्शक न मिला जो उपदेश देता और संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से केश पकड़ कर निकाल लेता। —25— संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत। अर्थ: सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता। चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता। —26— कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ। जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ। अर्थ: कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है। —27— तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई। सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ। अर्थ: शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। —28— कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय। सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय। अर्थ: कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए। सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा। —29— माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर। आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर । अर्थ: कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन। शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं। —30— मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई। पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई। अर्थ: मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो , उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई न खाएगा। —31— जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही । सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।। अर्थ: जब मैं अपने अहंकार में डूबा था — तब प्रभु को न देख पाता था — लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया तब अज्ञान का सब अन्धकार मिट गया — ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया। —32— कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी । एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ।। अर्थ: कबीर कहते हैं — अज्ञान की नींद में सोए क्यों रहते हो? जिस मार्ग पर तुझे चलना है उसी मार्ग का स्मरण कर — उसे ही याद रख — उसे ही संवार सुन्दर बना — —58— बिन रखवाले बाहिरा चिड़िये खाया खेत । आधा परधा ऊबरै, चेती सकै तो चेत ॥ अर्थ: रखवाले के बिना बाहर से चिड़ियों ने खेत खा लिया. इसलिए कभी गर्व न करना चाहिए —57— जांमण मरण बिचारि करि कूड़े काम निबारि । जिनि पंथूं तुझ चालणा सोई पंथ संवारि ॥ अर्थ: जन्म और मरण का विचार करके , बुरे कर्मों को छोड़ दे. जब घडा फूट जाए तो उसका जल जल में ही मिल जाता है — अलगाव नहीं रहता — ज्ञानी जन इस तथ्य को कह गए हैं! हमारे मन में जो पाने की ललक है जिसे पाने की लगन है, उसके बिना सब निस्सार है. प्रेम रस में डूबे रहना जीवन का सार है. मूर्ख लोहे के सामान है जो जल में तैर नहीं पाता डूब जाता है. सर पर धन की गठरी बांधकर ले जाते तो किसी को नहीं देखा.

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तलवार की धार ही उसका मूल्य है — उसकी म्यान तलवार के मूल्य को नहीं बढाती. माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर, कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर। अर्थ : कई युगों तक या वर्षों तक हाथ में मोतियों की माला घुमाने और जपने से किसी भी व्यक्ति के मन में सकारात्मक विचार उत्पन्न नहीं होते, उसका मन शांत नहीं होता। ऐसे व्यक्तियों को कबीर दास जी कहते हैं कि माला जपना छोड़ो और अपने मन को अच्छे विचारों की ओर मोड़ो या फेरो। 9. मक्खी गुड में गडी रहे, पंख रहे लिपटाये, हाथ मले और सिर ढूंढे, लालच बुरी बलाये। अर्थ : इस दोहे में Kabir Das Ji नें लालच कितनी बुरी बाला है उसके विषय में समझाया है। वे कहते हैं मक्खी गुड खाने के लालच में झट से जा कर गुड में बैठ जाती है परन्तु उसे लालच मन के कारण यह भी याद नहीं रहता की गुड में वह चिपक भी सकती है और बैठते ही वह चिपक जाती है और मर जाती है। उसी प्रकार लालच मनुष्य को भी किस कदर बर्बाद कर सकती है वह सोचना भी मुश्किल है। 12. परम की प्राप्ति के लिए अहम् का विसर्जन आवश्यक है. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय। अर्थ : कबीर जी कहते हैं उच्च ज्ञान पा लेने से कोई भी व्यक्ति विद्वान नहीं बन जाता, अक्षर और शब्दों का ज्ञान होने के पश्चात भी अगर उसके अर्थ के मोल को कोई ना समझ सके, ज्ञान की करुणा को ना समझ सके तो वह अज्ञानी है, परन्तु जिस किसी नें भी प्रेम के ढाई अक्षर को सही रूप से समझ लिया हो वही सच्चा और सही विद्वान है। 2. माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोये एक दिन ऐसा आयेगा मैं रौंदूंगी तोय। अर्थ : मिटटी कुम्हार से कहती है, तू क्या मुझे गुन्देगा मुझे अकार देगा, एक ऐसा दिन आयेगा जब में तुम्हें रौंदूंगी। यह बात बहुत ही जनने और समझने कि बात है इस जीवन में चाहे जितना बड़ा मनुष्य हो राजा हो या गरीब हो आखिर में हर किसी व्यक्ति को मिटटी में मिल जाना है। 5.

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